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गाँवों के बदलते परिदृश्य by Mr Shailendra Sharma


गाँवों के बदलते परिदृश्य पर एक पुरानी
छन्दमुक्त रचना

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गाँव में समा रहा
शहर धीरे धीरे..!
मिट रही है खासियते
जो गाँव को गाँव
बनाती थी...!!
गाँव जिसमे रची
प्रेमचन्द की कहानियां..!
गाँव जिससे शहर
लेता था सबक
भाईचारे, प्रेम का...!!
लेकिन शहर से 
सीख रहा है अब गाँव..!
और तिल तिल
मर रही आत्मा 
गाँव की...!!
कुछ शेष कमी
पूरी कर रही है
राजनीति..!
गाँव में मुखिया 
होने की...!!
गुर्रिल्ला आक्रमण 
कर रही है राजनीति
गाँव के ऊपर..!
जिसमे शिकार 
बेखबर है पूरी तरह...!!
लोग अलग अलग
ध्रुव बनाते..!
एक दूसरे की 
नींव दरकाते..!!
कुछ फिसलते
जैसे तेल पर..!
कभी यहाँ 
कभी वहाँ...!!
सम्बन्धों के नये
समीकरण बनाते..!
कुछ से अलग
कुछ के समीप आते...!!
भोले भाले लोग
इजाद कर रहे है..!
गणित के
नये नये सूत्र...!!
कब किसे दुआ सलाम
और किसको गाली..!
नजर आ रहे है
सब चाणक्य...!!
क्या हुआ इनको..?
गेंहू बदल गया
या हवा...!
या फिर पानी ने
बदल ली तासीर...!!
लेकिन साथ में 
ये बदल रहे है
अपनी तकदीर..!
और मेरा प्यारा गाँव
धीरे धीरे मर रहा है...!!
ख़ुश हैं सब..!
रो रहा है पुराना बरगद..!!
भूल गया जो 
सावन के झूले...!!!
रो रहा है पीपल..!
और हैरान है 
गाँव के बाहर 
वाला मठ...!!
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https://www.facebook.com/shailendra.sharma.161

सप्रेम-शैलेन्द्र
लखनऊ

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