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ईर्ष्या व असंतोष

ईर्ष्या व असंतोष 



किसी से स्पर्धा न करें ।किसी से आगे निकलना हैं और किसी को पीछे छोड़ना है ,ऐसा मानस रखने से ईर्ष्या और असंतोष बढ़ता है ।अपनी शक्ति का पूर्ण उपयोग करें लेकिन अन्य को नुकसान पहुचाने का इरादा न बनाए ।हो सकता हैं अन्य को कमजोर करने के चक्कर मे खुद आप ही कमजोर साबित हो जाये।

आप के नसीब में जो हैं वहः तो आप को मिलता ही है ।आप के नसीब जो नही है वह आप को नही मिलता हैं ।

अन्य की सफलता देखकर मन मे जलन बनाना सरासर मूर्खता हैं ।आप के  पास जितना है आप उससे खुश रह सकते हैं ।

आप खुद की तुलना अन्य से न करे ।आप अपने आप मे एक अच्छी जिंदगी जी रहे हो।

ऐसे लोग भी है जो आप की तरह सम्पन्न नही है ।आप खुद के सम्बंध में आत्म संतोष बनाये रखे।मन को अतृप्ति से दूर रखें।

आप केवल खुद के कमजोर या अधूरे विचारों को पराजित कीजिये ।जो विचार प्रसन्नता को तोड़ता है उसे दूर हटा दे ।

सात्विक भूमिका से खुद को खुश रखो।स्पर्धा,आक्षेप,आरोप-परीत्यारोप,ये सब बेकार की चीजें हैं ।

प्रेरणा,प्रसंशा, सद्भाव,जैसे उत्तम तत्वों को जीवन मे अग्रिमता दीजिये ।

संस्करण आत्मबोध से लिया गया

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