ad02jan2018

रेत का घर

*" रेत  का घर "*

*क्यों    भूल   गया तू  ,*
*ये   रेत  का   घर  है  ?*
*दूर - दूर   तक   यहाँ  ,*
*जन- जमीन  बंजर है ।*

*अब  यहाँ   पर  कोई ,*
*फल-फसल न  उगेगी ।*
*देख   लेना कल यहाँ  ,*
*नेह-  दीप  न  जलेगी ।।*

*तू लाख कर कोशिश  ,*
*सफलता कोसों दूर है ।*
*जितना जालिम  है ये  ,*
*उतना ही  मगरूर   है ।।*

*तेरे   "प्रेम  का पौधा" ,*
*यहाँ  सूख    जायेगा ।*
*व्यर्थ होगा सभी श्रम  ,*
*पीछे       पछतायेगा ।।*

*समझाना  मेरा  काम ,*
*आज    ही  जान  ले ।*
*ऊसर    उर   उसका  ,*
*मन का कहा मान ले ।।*

*बहुत आये और  गये ,*
*यहाँ इश्क बीज  बोने ।*
*कुछ नहीं मिला  उन्हें ,*
*सिवाय  सर्वस्व खोने ।।*

*इस  खंडहरों  में  देख  ,*
*उनकी अस्थियाँ यहाँ ।*
*जम गये उनके सपने  ,*
*जली   बस्तियाँ  जहाँ ।।*

*हे! मन  मनुज   क्यों ,*
*इतना     परेशान   है ?*
*हार  कर  जीतना ही ,*
*फितरत    इंसान   है ।।*

*मन की  बातों    को ,*
*माना    होता    गौरी ।*
*होता   न    शहंशाह  ,*
*प्रेरणा का सिर मौरी ।।*

*मन की  बात   मानें ,*
*अगर   होते     राम ।*
*रामसेतु  नहीं  होता ,*
*रावण-काम  तमाम ।।*

*होनी तो   होकर  ही ,*
*रहती सदा   जग  में ।*
*मगर   वीर    व्यक्ति  ,*
*डिगता नहीं  मग  में ।।*




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