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सरकारी_दूल्हा....

सरकारी_दूल्हा......(व्यंग)





जैसे ही किसी गाँव के लड़के की सरकारी नौकरी लगती है,उसकी ज़िन्दगी क्रांतिकारी रूप से बदल जाती हैं।ये परिवर्तन भारतीय कृषि में हरितक्रांति के बाद आये परिवर्तन से भी बड़ा होता हैं।जो लड़का कल तक बाप के लिए "नाकाम,नालायक और निकम्मा" था वो अब रातो-रात बाप का "नाक" हो जाता हैं।अगुवो(शादी करने वाले बिचौलिया)कि जमात में ये नौकरी पाने वाले लड़के की खबर किसी नार्थ कोरिया में किये गए नए परिक्षण से भी तेज़ फैलती हैं।उसके बाद लड़के का घर,घर नहीं शेयर मार्केट माफिक ब्रोकर का अड्डा हो जाता हैं,हर अगुवा दूल्हे रूपी शेयर का रेट अपने हसाब से "शेयरहोल्डर बाप" से तय करता हैं।
                   एक सरकारी नौकरी के बाद सब कुछ "नायक" फिल्म के तरह रातो रात बदल जाता हैं।जिस घर में बाप-चाचा,भईया-भौजी सब कटोरा-कटोरी-गिलास में वर्षो से ही चाय पीते आ रहे हो उस घर में किसी नव-परिवार नियोजन योजना की तहत नए "टी सेट" बाजार से एक दम इम्पोर्टेड लांच की जाती हैं।बिस्कुट पानी चीनी से लेकर चायपति तक का खर्चा कई सौ गुना बढ़ जाता हैं।जो बाप ने लड़के के स्कूल में फटे जुते के बदले हज़ार बात सुना के नए जूते के पैसे दिए हो उसे ये सब खर्च बिलकुल बोझ नहीं लगता।क्योंकि वो जनता हैं कि एक सटीक चाय की तीर अगर निशाने पे लग गईं तो घर की मध्यकालीन युग की खटारा बाइक "बोलोरो" और सिसकती खटिया से लेकर सड़ती काठ की कुर्शी भी "सोफा-सेट" में बदल सकती हैं।जो पडोसी लड़के के निकम्मे नकारक होने की हर रोज़ संपादीकी लिखा करते थे वो भी आज लड़के के परिश्रम व् होनहार होने के रामचरितमानस बाँचते नहीं चुप होते हैं।घर का नज़ारा और भी रंगीन होता हैं।मोबाइल पे जो लड़का बिपाशा,सकीरा और खलीफा की फोटू देखते हुए सैकड़ो बार माँ ने धरा हो और उस बात पे सैकड़ो बार पिता लतियाया हो,वो भौजी द्वारा "गुलदस्ते के पास पूरी साड़ी" में सांस्कारिक रूप से खिंचे गई लड़की की फोटू देखते एसे शर्माता है जैसे मनो किसी ने नई दुल्हन के घुघट खिंच दिया हो।घर के लिए तो ये लड़का मोदी के मेक इन इंडिया से भी बड़ा प्रोजेक्ट होता तो हैं ही,रिस्तेदारो के बीच में नौकरी पाने के बाद ये लड़का,अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ट्रम्प के चुनाव जीतने बाद से भी बड़ा सनसनी खेज़ इशू हो जाता हैं।दसो गाँव में दो-चार दिन तक प्रधानी के बाद सबसे ज्यादा चर्चा के विषय होता हैं।
                      गाँव में सरकारी नौकरी पाने वाले लड़के का क्रेज़ किसी इंजीनिय-डॉक्टर से भी  बड़ा होता हैं,क्योंकि गाँव में सिर्फ दो तरह के लड़के होते हैं,या तो सरकारी "नौकरी वाला" या फिर बिना सरकारी नौकरी के लड़का।

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