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समाज में बढ़ रही अमानवीय घटनाओ का क्या कारण है?

समाज में बढ़ रही अमानवीय घटनाओ का क्या कारण है?
दरअसल प्रेम खत्म हो रहा है. और जिसे हमने प्रेम कहा है वह वासना से बढ़ कर कुछ नहीं है.
मानवता खत्म हो रही है. धर्म खत्म हो रहा है. मानव मूल्यों को हमने तिलांजलि दे दी है. धर्म को अधर्म में बदल दिया.
हमने धन को चाहा है, महलों को चाहा है, आभूषणों को चाहा है, शरीरों को चाहा है.
और इनको पाने को जीत का नाम दे दिया है.
पर क्या यह वाकई में जीत हुई है.
उदाहरण के लिए एक व्यक्ति प्रेम पूर्वक अपना सब कुछ आपको अर्पण कर देता है और एक से जबरदस्ती आप सब कुछ हथिया लेते हो. जंग से या क़ानूनी कार्यवाही द्वारा. बहुत बहुत अंतर है दोनों स्थितिओं में.
प्रेम से दी गयी वस्तु दोनों तरफ असीम ख़ुशी और चरम सुख का अनुभव करवाती है.
और जंग से जीते गए देश हिरोशिमा और नागासाकी जैसी धरती पैदा करते हैं यहाँ सालों सालों तक मानवता और प्रेम नहीं जन्म ले सकता.
तो यही हुआ है मनुष्य ने अपनी सन्तानो को सिखाया पैसे के पीछे भागना, वस्तुओं को पाने के लिए उतावले होना, जमीन के लिए खून बहाना और अब वह संताने सब जगह उत्पात मचा रही हैं.
अमरीका की घटनाएँ , इंग्लॅण्ड के दुखद अनुभव हमे याद हैं. ब्लू वेळ को हम सब जानते हैं. एक साधारण से दुखी मानव ने कुछ ऐसा बना दिया हैं जो बच्चों को मौत के मूह में घसीटकर ले जा रहा हैं. और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं.
तो दुख, घृणा, तृष्णा, लोभ, काम जो हमारे अंदर दबे बैठे हैं. वही आक्रांत हो रहे हैं उत्पात मचा रहे हैं. हुआ यह हैं की हमने उन्हें अंदर बंद कर दिया हैं और यह सबसे ज्यादा आदमी ही कर रहे हैं. औरते नहीं कर रही हैं. औरत सहनशीलता सीखते सीखते इतनी ताकतवर हो गयी हैं की वो कभी आत्महत्या नहीं करती.
वह रो कर अपना दुख व्यक्त कर देती हैं और दुख बहार निकल जाता हैं. आदमी खुद को ताकतवर दिखने के लिए रो भी नहीं सकता. पर उसी दुख को किसी और को यातना दे कर खुश होने का पर्यटन करता हैं.
परन्तु नहीं जानता की दुख से कभी सुख नहीं जन्म ले सकता.
तो समस्याएं तो बहुत हैं हल क्या हैं. आइये हल ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं.
हल एक ही हैं हमें प्रेम को पाना हैं.जो भटक गए हैं उन्हें प्रेम से समझाना हैं. जो दुखी हैं उन्हें प्रेम से सहलाना हैं . ऐसा करने से दुख आंसू के रूप में बाहर निकल जाएं. दुख का अंदर रहना पीड़ा दायक हैं. बाहर निकलना मन को शांत कर देता है.
हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि दुख को कैसे व्यक्त करना है, क्रोध को कैसे बाहर निकालना है. उनसे वार्तालाप करनी होगी कि कहीं उनके अंदर कुछ दब तो नहीं रहा, कुछ घुट तो नहीं रहा. उन्हें बात कहने के अवसर देने होंगे.
तांकि उन्हे उनके प्रश्नो के हल मिल सकें. सही तरीके के हल न कि गलत तरीके के हल जो विश्व के लिए खतरा पैदा हो जाएं.
जो ब्लू वेळ और आई ऐस आई ऐस के रूप में बाहर न निकलें बल्कि कुछ नया सृजन करने के लिए बाहर निकलें.


रविन्द्र शर्मा
तकनीशियन 
केमिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट,
संत लोंगोवाल अभियांत्रिक एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, लोंगोवाल, पंजाब-१४८१०६

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